गुरुवार, 27 मई 2010

अंकिता पुरोहित कागदांश की हिन्दी कविता




अंकिता पुरोहित "कागदांश" की हिन्दी कविता



मैं ही थकती हूं



वे
तोड़ते है पत्थर
हर रोज भरपूर मेहनत से
बहाते है पसीना
होम कर निज बदन
माना निकाल ही लेंगे
चमचमाता हीरा ।

अभी लगन है
श्रम के प्रति
कर रहे अपना काम
विश्वास से,
ईमान से,
रोकते नहीं उल्टे
आंधी और तुफान
जैसे कि पा ही लेंगे
अपना मुकाम।

मैं देखती हूं
एक-टक
सुनती हूं
टक-टक
वे नहीं थकते
मैं ही थकती हूं
देखते-देखते।

उनकी आंखों में
सपना हैं।
सपनों में ही हो सकता है हीरा
मेरी आंखों मे तो
वे ही है हीरा।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर .... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...

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  2. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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  3. कमाल की प्रस्तुति ....जितनी तारीफ़ करो मुझे तो कम ही लगेगी

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  4. लघु मानव पर लिखी गई सशक्त कविता........बेहतरीन व सार्थक प्रस्तुति के लिए बधाई।

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  5. मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  6. कागद का अंश -कगदांश....सही है ?
    सुंदर कविता .... जारी रखें

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  7. शब्द भाव, और शिल्प; .......अभिराम!
    सर्वहारा चिंतन और गहन अभिव्यक्ति; .......अभिराम!
    कागद है अभिराम तभी, है जब कागदांश; .......अभिराम !!
    रुके ना कलम ये कभी. लिए भाव व्यंजना
    चलती रहे...अविराम ! अविराम ! अविराम !!

    सुन्दरतम और सफलतम प्रयास.... माँ शारदा के हमेशा अनुकम्पा बनी रहे...बधाई. !!

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