अंकिता पुरोहित "कागदांश" की हिन्दी कविता
मैं ही थकती हूं
वे 
तोड़ते है पत्थर
हर रोज भरपूर मेहनत से
बहाते है पसीना
होम कर निज बदन
माना निकाल ही लेंगे
चमचमाता हीरा ।
अभी लगन है
श्रम के प्रति
कर रहे अपना काम
विश्वास से,
ईमान से,
रोकते नहीं उल्टे
आंधी और तुफान
जैसे कि पा ही लेंगे
अपना मुकाम।
मैं देखती हूं
एक-टक
सुनती हूं
टक-टक
वे नहीं थकते
मैं ही थकती हूं
देखते-देखते।
उनकी आंखों में
सपना हैं।
सपनों में ही हो सकता है हीरा
मेरी आंखों मे तो
वे ही है हीरा।

तोड़ते है पत्थर
हर रोज भरपूर मेहनत से
बहाते है पसीना
होम कर निज बदन
माना निकाल ही लेंगे
चमचमाता हीरा ।
अभी लगन है
श्रम के प्रति
कर रहे अपना काम
विश्वास से,
ईमान से,
रोकते नहीं उल्टे
आंधी और तुफान
जैसे कि पा ही लेंगे
अपना मुकाम।
मैं देखती हूं
एक-टक
सुनती हूं
टक-टक
वे नहीं थकते
मैं ही थकती हूं
देखते-देखते।
उनकी आंखों में
सपना हैं।
सपनों में ही हो सकता है हीरा
मेरी आंखों मे तो
वे ही है हीरा।